'कागद’ हो तो हर कोई बांचे….
"कागद" रा कीं खास "कागद"
Friday, June 01, 2012
सच बता भगवान
सच बता भगवान
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भगवान को नहीं देखा
मंदिरों से निकल
पहाड़ों से उतर
कभी आते-जाते
भूखे-दुखी-गरीब के घर
दुखों में
आकंठ डूबा आदमी
हो असहाय जाता है
मंदिरों में
पर्वत शिखर पर
पाषाण ढले
भगवान की शरण
लौटने पर
सुख तो नहीं
दिखता है
चेहरे और पांवों पर
उतर आया
दुखों का पहाड़ ।
पहाड़ का पत्थर
तराश तराश
जिसे ने दिया
तुझ निराकार को
मनमोहन आकार
वह भूखा
तुझ को भोग
क्यों भगवान
क्यों रचता है
ऐसे योग-दुर्योग !
तेरी कृपा पाने
अपना और परिवार का
पेट काट
खरीद चढ़ाता है
रुचिकर चढ़ावा
ऐसा भोग
कैसे लगा लेता है
सच बता भगवान !
स्थाई रोजगार
दो जून रोटी की
लगा कर अरजी
रख-रख उपवास
करता है सवामणी
भरता है भक्त
तेरा पेट-पाषाण
सचा बता
कैसे खा लेता है तूं
भूखे के सामने
सवा सवा मण ?
यह भी तो बता
तुझ निराकार को
क्यों लगती है
इतनी भूख
धार कर
रूप पाषाण !
Wednesday, May 30, 2012
भीतर का दर्द
भीतर का दर्द
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भीतर के दर्द की
आती है जब उबाक
छूटता है खाना-पीना
बाहर तो बहुत कम
मगर भीतर ही भीतर
टूटता है बहुत कुछ ।
मीतर पड़ा दर्द
तोड़ता है खुद को
आते ही बाहर
बनता है तमाशा
भीतर से अधिक
बाहर है निराशा !
मेरे दर्द
मेरा अपना है तू
भीतर ही ठहर
मैं ही सुलाऊंगा तुझे
दे कर थपकियां !
दो कविताएं
मेरे सोच की गली
मेरे सोच की हर गली
जा कर तेरी बस्ती में
क्यों हो जाती है गुम ।
तेरी बस्ती से कभी
निकल कर कोई गली
आती क्यों नहीं इधर ।
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उन के ऊंचे भाव
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आते उनको दाव बहुत हैं ।
दिल में इस के घाव बहुत हैं ।।
जब चाहें कर दें कत्ल मेरा ।
मरने का भी चाव बहुत है ।।
अपनी कीमत ख़ाक बराबर ।
उनके ऊंचे भाव बहुत हैं ।।
अपनी आदत खुल कर कहना ।
उनके यहां छुपाव बहुत है ।।
जब भी खाते हक़ ही खाते ।
हक़खोरी में हाव बहुत है ।
अपना मत जो उनको सौंपा ।
अब जनमत का ताव बहुत है ।
बोल बता
बोल बता
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हम सब यकसां
यकसां आए धरा पर
धरती ओ आकाश
अन्न-जल-हवा सांझी
सांसें अपनी-अपनी
लेते जेसे तैसे !
आंख मींच कर
रोटी छीनी
पानी झपट सारा
सांस हमारी
गिरवी तेरे
तेरे जुल्मों के आगे
क्यों नहीं वश हमारा ?
आज धरा पर
तू ही डोले
आंख मूंद कर
लेता नभ में झोले
बोल बता
कहां है हिस्सा मेरा
बिना खटै ही
हो गया कैसे तेरा ?
धरती के कौन हैं पेड़
धरती के कौन हैं पेड़
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पुष्प का सुख
टहनी को कम
फिजाओं को जादा
मिलता है
अज्ञात देव-दानव
ज्ञात प्राणी
सब भोगते हैं
सुख पुष्प का !
पुष्प का जन्मदात
पोषक निरीह पेड़
झेलता है वियोग
उम्र भर
इस दंश का
अपने वंश का !
कल फिर खिलेगा
महकदार सुर्ख पुष्प
इसी आस में
तना रहता
अपने तने पर
अपनी जड़ों पर ।
पेड़ जानता है
कल देखना है
यदि अनुकूल-सुखद
तो जरूरी है
जड़ों के साथ
तने पर तने रहना
वह यह भी जानता है
धरती ही रचती है
सकल सुख मुझ में !
इसी लिए
झड़ते पुष्प-पत्ते देख
मौन है पेड़
फिजाएं नहीं जानती
इस धरती के
कौन हैं पेड़ !
स्मृति देती है तनाव
स्मृति देती है तनाव
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सागर की गहराई
अथाह जलराशि
नहीं करती परेशान
किनारे देते हैं तनाव
कि पार होंगे कि नहीं
कि कहीं डूब न जाएं
उतर भी लें यदि
उस गहराई में
रम भी लें आकंठ
तब भी
किनारे छूने की चाह
बनाए रखती है तनाव
जैसे कि
मिलने और बिछुड़ने को
भूल कर भोगते हैं हम
इसके बीच का समय
क्या जरूरी है
याद रखना उन क्षणों को
जिनमें हुआ था
मिलना - बिछुड़ना
जिनकी स्मृति
दे ही जाती है तनाव ।
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